पाठ परिचय
मीराबाई सगुण भक्ति धारा की प्रमुख कवयित्री हैं। वे श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं। प्रस्तुत पदों में मीरा ने अपने आराध्य (श्रीकृष्ण) से अपनी पीड़ा दूर करने की प्रार्थना की है और उनकी सेविका (चाकर) बनकर उनके पास रहने की इच्छा व्यक्त की है।
पद 1
हरि आप हरो जन री भीर।
द्रौपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।।
भगत कारण रूप नरहरि, धरयो आप सरीर।
बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर।।
दासी मीरा लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर।।
प्रसंग इस पद में मीराबाई अपने आराध्य श्रीकृष्ण से सांसारिक दुखों और कष्टों को दूर करने की विनती कर रही हैं।
व्याख्या मीराबाई कहती हैं कि हे प्रभु (हरि)! आप अपने भक्तों के सारे दुख-दर्द दूर कर दीजिए।
1. जिस प्रकार आपने भरी सभा में द्रौपदी की लाज बचाने के लिए उसका चीर (वस्त्र) बढ़ा दिया था।
2. जिस प्रकार आपने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिंह (नरहरि) का शरीर धारण किया था।
3. जिस प्रकार आपने डूबते हुए हाथी (गजराज) को मगरमच्छ से बचाया और उसकी पीड़ा दूर की।
उसी प्रकार, आपकी दासी मीरा प्रार्थना करती है कि आप मेरी भी पीड़ा (दुख) को दूर कीजिए।
शब्दार्थ:
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| हरि | ईश्वर / श्रीकृष्ण |
| हरो | दूर करो |
| जन | भक्त / सेवक |
| भीर | पीड़ा / दुख / कष्ट |
| चीर | वस्त्र / साड़ी |
| नरहरि | नरसिंह अवतार |
| कुण्जर | हाथी |
पद 2
स्याम म्हाने चाकर राखो जी,
गिरधारी लाल म्हाने चाकर राखो जी।
चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ, नित उठ दरसण पास्यूँ।
बिन्दरावन री कुंज गली में, गोविन्द लीला गास्यूँ।।
चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनों बाताँ सरसी।।
प्रसंग इस पद में मीराबाई श्रीकृष्ण के समीप रहने के लिए उनकी नौकरानी (सेविका) बनने की इच्छा प्रकट कर रही हैं।
व्याख्या मीराबाई कहती हैं कि हे श्याम! मुझे अपनी दासी (चाकर) बना लो। मैं आपकी सेवा करूँगी और आपके लिए बाग-बगीचे लगाऊँगी, ताकि जब आप सुबह घूमें तो मैं आपके नित्य दर्शन पा सकूँ।
मैं वृंदावन की संकरी गलियों में आपकी लीलाओं के गीत गाऊँगी। आपकी सेवा (चाकरी) करने से मुझे तीन फायदे होंगे:
1. मुझे हमेशा आपके दर्शन मिलेंगे।
2. आपका नाम स्मरण (याद) करना ही मेरा जेब खर्च होगा।
3. मुझे भाव और भक्ति रूपी जागीर (संपत्ति) प्राप्त होगी।
शब्दार्थ:
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| स्याम | श्रीकृष्ण |
| चाकर | नौकर / सेवक |
| रहस्यूँ | रहूँगी |
| लगास्यूँ | लगाऊँगी |
| नित | रोज / हमेशा |
| दरसण | दर्शन |
| जागीरी | साम्राज्य / संपत्ति |
पद 2 (भाग - सौंदर्य वर्णन)
मोर मुगट पीताम्बर सौहे, गल वैजन्ती माला।
बिन्दरावन में धेनु चरावे, मोहन मुरली वाला।।
ऊँचा ऊँचा महल बनावूँ, बिच बिच राखूँ बारी।
साँवरिया रा दरसण पास्यूँ, पहर कुसुम्बी साड़ी।।
आधी रात प्रभु दरसण दीज्यो, जमुना जी रे तीरा।
मीरा रा प्रभु गिरधर नागर, हिवड़ो घणो अधीरा।।
व्याख्या मीरा श्रीकृष्ण के रूप का वर्णन करती हैं: उनके सिर पर मोर मुकुट, शरीर पर पीले वस्त्र (पीताम्बर) और गले में वैजयंती माला सुशोभित है। वे वृंदावन में गायें चराते हैं और मुरली बजाते हैं।
मीरा कहती हैं कि मैं ऊँचे-ऊँचे महल बनाऊँगी और उनके बीच में खिड़कियाँ/बागीचे रखूँगी। मैं लाल रंग की (कुसुम्बी) साड़ी पहनकर अपने साँवरे प्रभु के दर्शन करूँगी।
हे प्रभु! मेरा मन (हृदय) आपसे मिलने के लिए बहुत व्याकुल है। आप मुझे आधी रात को यमुना नदी के किनारे दर्शन देने आइएगा।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| पीताम्बर | पीले वस्त्र |
| धेनु | गाय |
| बारी | बगीचा / खिड़की |
| कुसुम्बी | लाल रंग की (साड़ी) |
| हिवड़ो | हृदय / दिल |
| अधीरा | व्याकुल / बेचैन |